शांति खोलकर खड्ग क्रांति का

जब वर्जन करती है,
तभी जान लो किसी समर का
वह सर्जन करती है।

राष्ट्रकवि दिनकर काव्यकुसुम श्रृंखला में आज की पंक्तियाँ ‘कुरुक्षेत्र’ से!

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