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निर्णायक लड़ाई अकेले लड़ेगी कांग्रेस, रामलीला मैदान से देश को दिया संदेश

-भाजपा ने 2026 के चुनावी चुनौतियों को लेकर किया संगठन में बड़ा बदलाव

-रितेश सिन्हा

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कांग्रेस रैली के नाम पर देश को संदेश देने के बहाने अपना राग अलाप रही है। संगठन में बदनाम और दागदार नेता जस के तस बने हुए हैं। हार के बाद कांग्रेस में समीक्षा तो होती है, लेकिन जिम्मेदारी कोई नहीं लेता, न ही कोई कार्रवाही होती है। यही वजह है कि राहुल मैदान में दहाडते दिखते हैं, चुनाव प्रचार भी होता है, मगर टिकट बंटवारे से आयातित नेताओं से हतोत्साहित कार्यकर्ता मैदान छोड़ देता है। फिर परिणाम बिहार, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा की तरह आते हैं। संगठन में कांग्रेस जीरो है, वहीं आलोचनाओं के बावजूद भाजपा संगठन के बूते चुनाव जीतने में कामयाब रहती है। भाजपा ने आने वाले समय में असम, यूपी, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे सूबों में अपनी राजनीतिक बढ़त बनाने के लिए प्रदेश की सामाजिक ताने-बाने के हिसाब से संगठन में नई तैयारियों में जुटी है। कांग्रेस और भाजपा में यह बुनियादी फर्क साफ दिखता है जिसे रैली से आटा-पाटा नहीं जा सकता।

दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस ने ’एसआईआर’ और ’वोट चोरी’ के खिलाफ जबर्दस्त प्रदर्शन किया और अपनी ताकत अपने बूते दिखाने की कोशिश की। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं ने देश भर से आए हुए अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को वोटचोरी और एसआईआर के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने का आह्वान किया। यह पूरा कार्यक्रम सत्ता पक्ष को ललकारते हुए चुनाव आयोग पर सीधा हमला था। वहीं बिहार से रैली में शामिल होने पहुंचे निष्कासित नेताओं की लंबी फौज ने वोट चोरी की बजाए टिकट चोरी के मुद्दे को खासा गरमा दिया। कांग्रेस का मानना है कि सरकार और चुनाव आयोग की मिलीभगत से सुनियोजित तरीके से देश में वोट चोरी की जा रही है। इस महारैली के आयोजन के पीछे मुख्य उद्देश्य बिहार चुनाव में मिली करारी हार से देश भर के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना था। चुनाव से पहले बिहार में राहुल के नेतृत्व वोट चोरी और एसआईआर के खिलाफ जबर्दस्त पदयात्रा निकाली गई थी और कार्यकर्ताओं में जबर्दस्त उत्साह देखा गया था।

कांग्रेस के इस कदम के बाद राजद ने अपने पुराने पैतरे को अपनाते हुए पार्टी में अपने संपर्क सूत्रों को तेज किया और गठबंधन के नाम पर उसे झुका लिया। इसमें राजद से कांग्रेस में आए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को मना लिया, साथ ही अपने एक रिश्तेदार और पूर्व ओबीसी चेयरमैन को राजद ने पटना बुलाकर प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष को छाप लिया। इस पूरी कवायद ने बिहार में उठ रहा कांग्रेस का तूफान शांत कर दिया। बिहार कांग्रेस ने निष्कासित 43 नेताओं और दो दर्जन से अधिक जिलाध्यक्षों को ठंडा करते हुए गठबंधन की गांठ में पार्टी को मजबूती से बांध दिया। कांग्रेस को रोकने को पुरजोर कोशिशों में 74 में लड़ी कांग्रेस को 61 सीटों का झांसा दिया, 12 से अधिक सीटों पर दोस्ताना मुकाबले में कांग्रेस को चित कर दिया।

बिहार में कांग्रेस के नेताओं को सोची-समझी रणनीति के तहत घर बिठा दिया गया जिसमें पूर्व गवर्नर निखिल कुमार, सांसद तारिक अनवर, मोहम्मद जावेद सहित अन्य सांसदों को अपने क्षेत्र विशेष तक सीमित रखा। अकेले कांग्रेस की लड़ने की बात करने वाले पूर्व मंत्री श्याम सुंदर सिंह धीरज, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष चंदन बागची, रामजतन सिन्हा को घर से निकलने देने के पूरे इंतजाम ने पार्टी की लुटिया डूबो दी। टिकटों में भारी लेन-देन के साथ कारोबार करते हुए कांग्रेसी बेनकाब भी हुए। अशोक गहलोत, अधीर रंजन चौधरी और भूपेश बघेल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने राहुल समेत कांग्रेस दिग्गजों को पूरे एपिसोड की जानकारी दी। गठबंधन के चुनावी घोषणा पत्र में कांग्रेस और उनके नेताओं का कोई नामोनिशान नहीं था। राहुल गांधी की एक तस्वीर घोषणा पत्र में दिखी जो महज खानापूर्ति थी।

पिछड़ों की बात करने वाली कांग्रेस के बिहार में चुनाव प्रचार के बाद भी 243 सीटों वाले प्रदेश में 95 सीटों ने सभी दलों से अगड़े चुन कर आए। लोकसभा में बहस के दौरान भाजपा के राजपूत नेता राजीव प्रताप रूडी ने ये आंकड़े पेश किए। 33 से अधिक राजपूत नेता बिहार विधानसभा में पहुंचे। कांग्रेस सहित महागठबंधन उपमुख्यमंत्री के तौर पर मुस्लिम नेताओं का नाम पेश करने से बचती रही, नतीजा देश और बिहार का अल्पसंख्यक वोटर जो इस पाले में आना चाह रहा था, वो एआईएमआईएम के साथ चला गया। कटिहार, किशनगंज समेत जीते हुए अन्य क्षेत्रों में कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई। टिकट के खेल में चर्चित हुए निर्दलीय सांसद पप्पू यादव अधोघोषित रूप से कांग्रेस की बागडोर संभाले हुए थे, राजनीतिक रूप से शून्य प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष ने रही-सही कसर पूरी कर दी। रामलीला मैदान की रैली कांग्रेस की चुनाव प्रबंधन देख रहे मैनेजरों ने पार्टी में अपनी साख बचाने के लिए इस रैली का आयोजन किया।

रैली के ठीक पहले केरल के निकाय चुनाव में भाजपा की जीत ने विपक्ष को तगड़ा झटका दिया। राजनीतिक विश्लेषक इन दोनों चुनावों की समीक्षा करते हुए बताते हैं कि बिहार की हार का असर पूरे देश के कार्यकर्ताओं के गिरते मनोबल को उजागर करता है। केरल में भाजपा ने न केवल खाता खोला है, बल्कि अपनी एक मजबूत उपस्थिति दर्ज करायी है। कांग्रेस अपने दिग्गजों एके एंटोनी और शशि थरूर जैसे बेबाक नेताओं को किनारा लगाए हुए है। हालांकि प्रियंका गांधी केरल में अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज करायी है मगर वहां की स्थानीय राजनीति में अपना प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही है। कांग्रेस में दिग्गज बने हुए अन्य प्रदेशों से सदन में पिछले दरवाजे से एंट्री करने वाले केसी वेणुगोपाल केरल की राजनीति से एक जमाने से बाहर हैं।

पिछले दिनों बिहार में हार की समीक्षा के दौरान हारे हुए उम्मीदवारों ने प्रदेश अध्यक्ष, प्रभारी के अलावा केसी वेणुगोपाल पर भी संगीन आरोप लगाए थे। यही वजह थी कि हारे हुए उम्मीदवारों के तेवरों को देखते हुए बैठक के दौरान खरगे और राहुल को केसी वेणुगोपाल को बाहर भगाना पड़ा। कांग्रेस में इस रैली के बाद पार्टी में अमूल-चूल परिवर्तन की चर्चाओं ने जोर पकड़ा हुआ है। खरगे भी सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की लड़ाई को हवा देना चाहते हैं ताकि वो इन दोनों दिग्गजों की लड़ाई में अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को पूरा कर सकें। उनके बयान से इसका आभास मिलता है। इस रैली में राहुल और उनके टीम के तेवर पूरे देश में कांग्रेस को अकेले चुनावी मैदान में उतारने की दिखती है। गहलोत-अधीर-बघेल की तिकड़ी ने कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने की सिफारिश की है। देखना है कि वोट चोरी और एसआईआर को मुद्दा बनाने वाली और जमीनी लड़ाई को तेज करने में जुटी कांग्रेस राष्ट्रीय संगठन और प्रदेशों में कब तक परिवर्तन के लिए कदम बढ़ाती है।

यूपी में तीसरी बार भाजपा सरकार बनाने की कोशिशों में संगठन में केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को अध्यक्ष बनाकर जातिगत समीकरण को साध लिया है। वहीं बिहार से नितिन नवीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर बड़ी जिम्मेदारी दी है। वे पटना जिले के बांकीपुर सीट से पांचवीं बार जीते हैं। रातोंरात भाजपा के कार्यकर्ताओं को इन्होंने कांग्रेस का टिकट दिलवा दिया और भाजपा की जीत आसान कर ली। इसी का इनाम उन्हें बतौर राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष का पद भी मिला है। राजेश राम के माध्यम से उन्होंने प्रभारी समेत कांग्रेस के कर्ताधर्ताओं को अपने झोले में समेट लिया था और निश्चित कर लिया था कि प्रभावी नेताओं को टिकट वितरण से चुनावी प्रचार तक घर से न निकलने देने की मजबूत घेराबंदी करा दी।

आपको बता दें कि अपनी आक्रामक और राजनीतिक कौशल के लिए पहचाने जाने वाले नितिन ने सदाकत आश्रम में घूसकर कांग्रेसियों को जमकर पीटा था और हार के कारणों की समीक्षा के बाद 43 लोगों को कांग्रेस से निष्कासित करने वाले कपिलदेव यादव इन्हीं के खासमखास हैं। रातोंरात अनुशासन समिति के अध्यक्ष बनने वाले कपिलदेव यादव व कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम पेट्रोलियम व्यवसाय में अधोघोषित साझेदार हैं। निष्कासित चल रहे कांग्रेसियों की बात पर ध्यान दें तो सदाकत आश्रम में कांग्रेसियों की पिटाई के पीछे राजेश राम की सहमति की चर्चा आम है। कांग्रेस की रैली भले की बिहार हार के लगभग 1 महीने बाद हुई मगर समीक्षा के बावजूद पार्टी में प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष जस के तस बने हुए हैं। कांग्रेस महज रैली के माध्यम से देश को संदेश देने के बहाने अपना राग अलाप रही है। संगठन में बदनाम और दागदार नेता जस के तस बने हुए हैं। वहीं भाजपा अपने आने वाले 2026 के असम, यूपी, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे सूबों में अपनी राजनीतिक बढ़त बनाने के लिए नई तैयारियों में जुटी है। देखना है कि आने वाले चुनावों के मद्देनजर भाजपा और कांग्रेस किन मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में उतरेंगे और चुनाव नतीजों को अपने पक्ष में लाने के लिए क्या रणनीति अपनाएंगे।

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