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सवर्ण, दलित, मुस्लिम व पिछड़ों की उपेक्षा के साथ चुनाव में उतरेगी कांग्रेस

कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, किसी भी दल से आए आरोपी और मालदारों पर दांव

रितेश सिन्हा। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बिहार यात्रा के बाद अस्तित्व के लिए जूझ रही कांग्रेस के लिए बना माहौल अनुभवहीन प्रभारी और बोगस प्रदेश अध्यक्ष की वजह से अब खत्म हो गया है। 2020 में हुए बिहार चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन इस बार 58 सीटों पर ऑब्जर्बर भेज कर ये साफ कर दिया था कि यही सूची अंतिम है। चुनाव का एलान होते ही कांग्रेस के प्रभारी 54 पर आकर रूक गए। तेजस्वी के घर हुई महागठबंधन की बैठक में कांग्रेस को 48 सीटों पर रोकते हुए कारण बताया कि पिछले विधानसभा में 70 में से 19 सीटों पर ही कांग्रेस जीत सकी थी।

महागठबंधन में अधिक सीटें देने के फार्मूले में उन्होंने वो सीटें कांग्रेस को पकड़ा दी थी जो राजद सरकार बनाने के समय भी जीत नहीं सकी थी। राजद के लालू और जदयू के नीतीश कांग्रेस के अंदरखाने अपने लोगों को कांग्रेस हाईकमान के दलालों के माध्यम से प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी तय कराने में कामयाब रहे। दिल्ली दरबार में हाथ जोड़ते रहे ये दोनों शातिर बिहार में कांग्रेस को पिछले 30 सालों से किनारे पर रखते आ रहे हैं। यह खेल बदस्तूर जारी है। इस कड़ी में अखिलेश प्रसाद सिंह लगातार 8 चुनाव हारने के बाद भी प्रदेश अध्यक्ष भी रहे और दो बार राज्यसभा भी खींचने में कामयाब रहे। लालू ने बकायदा सदाकत आश्रम में अपने सम्मान समारोह में तत्कालीन अध्यक्ष अखिलेश की तरफ इशारा करते कांग्रेसियों को संदेश दिया था कि ये प्रदेश अध्यक्ष और दो बार सांसद भी हमने बनाया। हमारा विरोध बंद कीजिए।

वर्तमान कांग्रेस प्रभारी व अध्यक्ष भी राजद के अब गिरफ्त में हैं। इसी क्रम में लालू के घर से सीटों का फार्मूला भी तय हो रहा है। बाकी कांग्रेसी सारे भ्रम में हैं। कांग्रेस को 50 के अब लड़ाने के मूड में है। बिहार में राहुल गांधी के जाने के बाद कांग्रेसी घर से बाहर निकल आए थे, अब अपनी दाल गलती न देखकर जनसुराज की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। वहीं प्रभारी और अध्यक्ष ने कांग्रेस के सभी वरिष्ठ स्थानीय नेताओं को एक किनारे लगा दिया है। घर बैठ चुके नेताओं का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा।

पटना में कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमिटी के बाद दिल्ली से संभावित उम्मीदवारों के पास फोन द्वारा पैसे लेकर उनके टिकट कंफर्म करने की चर्चाएं बिहार में जोरों पर थी। टिकट बंटवारे के बाद स्थिति साफ हो जाएगी। अशोक गहलोत के साथ भूपेश बघेल और अधीर रंजन चौधरी के सामूहिक नेतृत्व में कांग्रेस ने 41 ऑब्जर्बर बनाए हैं। इनमें ओडिसा के प्रदेश अध्यक्ष जो कभी बिहार के प्रभारी थे, एक जिले के पर्यवेक्षक नियुक्त किए गए।

यूपी के पूर्व प्रदेश और अब ओडिसा के प्रभारी अजय कुमार लल्लू एक जिले में टिका दिए गए हैं। यही हाल वर्तमान में 80 जिलों वाले यूपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय भी 1 जिले में 1 विधानसभा के प्रभारी बनाए गए हैं। ऐसे 41 दिग्गजों को विधानसभा चुनाव जिताने की जिम्मेदारी दी गई है। देखना है टिकट बंटवारे के बाद कांग्रेस कितनी सीटों पर निकल पाती है। राजद ने कांग्रेस की परंपरागत सीट कहलगांव पर अपने राजद कार्यकर्ता को झामुमो के नाम पर उतार दिया है।

कांग्रेस की औकात महागठबंधन के राजद खेमे में वीआईपी के मुकेश साहनी से भी कम है। कांग्रेस को नीचा दिखाते हुए लालू परिवार वीआईपी सुप्रीमो मुकेश साहनी पर भावी उपमुख्यमंत्री का बिल्ला टांग कर चुनाव लड़वाना चाहता है। कांग्रेस भी अपनी सीटों पर मोहर लगवाने के बाद ही तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने के नाम पर सहमति देगी, ऐसी रस्साकसी महागठबंधन में जारी है। अभी तक महागठबंधन में गठबंधन की गांठ लगी नहीं है। कांग्रेस की पहली सूची में प्रभारी पूर्व विधायक के साथ-साथ मालदार उम्मीदवारों के नाम घोषित कराने की फिराक में हैं।

पूर्व प्रदेश अध्यक्षों मदन मोहन झा, अखिलेश प्रसाद सिंह, रामजतन सिन्हा, हिदायतुल्ला खां, लहटन चौधरी, पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार, बिहार के पूर्व मंत्री अवधेश सिंह, पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार के दत्तक पुत्र व पूर्व मुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल गफ्फुर के पोते समेत अनेक नेता पुत्रों के साथ प्रभारी का खर्चा उठाने वाले रीगा के पूर्व विधायक अमित कुमार टुन्ना और जदयू के आज तक नगर अध्यक्ष बिल्डर व कथित भू-माफिया राजू बर्नवाल का टिकट तय है। कांग्रेस में पिछले चुनाव से परंपरा है कि सरकारी दल कांग्रेस प्रभारी और अध्यक्ष से मिलकर अपने सामने कमजोर उम्मीदवार उतरवाने के लिए भरपूर सिचाई के संसाधन उपलब्ध कराते रहे हैं। इस कड़ी में पहला नाम पहला नाम राजू बर्नवाल का आ चुका है।

नेता पुत्रों की इस भीड़ में पूर्व केंद्रीय मंत्री व पूर्व राज्यपाल रामदुलारी सिन्हा और पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री केदार पांडेय का परिवार से कोई नाम प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष की रस्साकसी में तय नहीं हो पा रहा है। बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री डॉ भोला पासवान शास्त्री, दक्षिण बिहार के बड़ा दलित चेहरा रहे रामस्वरूप राम और विलट पासवान के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष विद्याकर कवि के पुत्र विभूति कवि के साथ इन नेता पुत्रों की स्थिति प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष के दरबार में दरबदर की है। दलितों और अतिपिछड़ों की राजनीति कर रही कांग्रेस में सर्वणों की दुर्गति तो हैं कि दलित नेताओं का हाल भी बहुत बुरा है जो जीवनभर कांग्रेस का झंडा लगाते रहे। जिस तरीके के नामों की चर्चा है, कांग्रेस दहाई पकड़ ले, इस पर संशय है।

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