देशब्रेकिंग न्यूज़

कोचिंग ही नहीं, सरकारी स्कूलों में भी सुरक्षा कवच बने ‘मनोवैज्ञानिक काउंसलर’ : डॉ. नयन प्रकाश गांधी

केवल कोचिंग नहीं, सरकारी स्कूलों में भी ‘मनोवैज्ञानिक काउंसलर’ अनिवार्य हों: डॉ. नयन प्रकाश गांधी

प्रधानमंत्री के मन की बात के साथ ही सरकारी स्कूल छात्रों के लिए फिजिकल भी बने मन की बात की नियमित व्यवस्था 

कोटा में दसवीं की परीक्षा से पहले टूटा एक सपना : पढ़ाई के दबाव और डर के बीच 16 वर्षीय छात्रा ने उठाया आत्मघाती कदम

छात्र आत्महत्या रोकथाम नीति पर पुनर्विचार जरूरी

डबल इंजन सरकार स्कूल स्तर से ही दे मानसिक सुरक्षा कवच, ब्लॉक स्तर पर काउंसलिंग और पेरेंट्स अवेयरनेस हो नीति का हिस्सा
कोटा में दसवीं की परीक्षा से पहले टूटा एक सपना, पढ़ाई के दबाव और डर के बीच 16 वर्षीय छात्रा ने उठाया आत्मघाती कदम
घटना कोटा जिले के दीगोद क्षेत्र की ,घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है

 डॉ. एन.पी. गांधी, लाइफ कोच पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट 

कोटा: हाल ही में कोटा जिले के दीगोद निवासरत परिवार की सौलह वर्ष की सरकारी स्कूली छात्रा का आत्महत्या कर एवं मजदूरी कर भविष्य बुनने वाले माता-पिता की उम्मीदों का टूटना अति भयावह दर्दनाक साबित हुआ है। ये भावुक उद्गार भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान मुंबई विश्विद्यालय के एलुमनाई डॉ. नयन प्रकाश गांधी ने व्यक्त किए। विशेष उल्लेखनीय है कि डॉ. गांधी स्वयं छोटे से गांव के सरकारी स्कूल से शिक्षित है । इसी जमीनी जुड़ाव के कारण उनकी अपील की है कि राज्य स्तर पर केवल कोचिंग ही नहीं, आज की समय की आवश्यकता के अनुसार बल्कि सरकारी स्कूलों में भी मनोवैज्ञानिक काउंसलर नियुक्त करने के दिशा निर्देश शिक्षा विभाग की नीति में शामिल हो। आखिरकार कब तक कोचिंग संस्थान को कोसते रहेंगे ,कोचिंग संस्थान कोच मार्गदर्शक की भूमिका निभाते है ,आय से सरकार को टैक्स देते है ईमानदारी निष्ठा के साथ उच्च सुविधाओं के साथ अपना कार्य करते है ,जरूरत है तो शुरुवाती स्तर पर पूरे स्कूली शैक्षणिक तंत्र को नवीन कलेवर में परिवर्तित करने की ,क्योंकि  शिक्षा की शुरुआत स्कूल से होती है,अतः सुरक्षा कवच भी वहीं से शुरू होना चाहिए एवं साथ ही ब्लॉक स्तर पर सरकारी स्कूलों के अभिभावकों को बच्चों के मानसिक बदलावों ,करियर मोटिवेशन ,साइबर सुरक्षा ,सोशल मीडिया के दुरुपयोग,मानसिक स्वास्थ्य आदि के बारे जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाए जाने की आवश्यकता बताई।गांधी ने कोचिंग में सुख सुविधाएं ,मनोवैज्ञानिक काउंसलर होते हुए भी कोचिंग स्टूडेंट की सुसाइड में माता पिता की भूमिका को और मजबूत करने की अनिवार्यता बताई है ,अतः सर्व सुविधाओं से लैस होने नियम संगत गुणवत्ता अध्ययन ,स्टूडेंट पेरेंट्स मीट,मोटिवेशन कार्यक्रम आदि में कोटा के कोचिंग संस्थान सबसे उत्कृष्ट है जिसका पूरे भारत नहीं विश्व में कोई सानी नहीं है ।सरकारी स्कूलों में अध्ययनरत  छात्रों की सुरक्षा जवाबदेही सुनिश्चित हो इसके लिए ब्लॉक स्तर पर मनोवैज्ञानिक काउंसलर नियुक्ति प्रभावी रूप से हो ताकि पूरे भारत में राज्य की डबल इंजन सरकार प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात अनुरूप फिजिकली रूप से स्कूली छात्रों के मन की बात को प्रभावी रूप से बता सके और ऐसे आत्महत्याएं रोकी जा सके साथ ही सरकारी स्कूलों में भी  साप्ताहिक जीवन प्रबन्धन ,मानसिक तनाव ,सफलता सूत्र , करियर मार्गदर्शन,डाउट प्वाइंट, मोटिवेशनल कार्यशाला अनिवार्य हो ।गांधी का मानना है कि एक रिसर्च के अनुसार अनिवार्य रूप से परीक्षा पूर्व तनाव  प्रबंधन सत्र कही हद तक इस तरह की आत्महत्याएं रोक सकते है ,यदि समय रहते बच्चे के मन को समझ लिया जाए, तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।क्योंकि सच यही हैएक परीक्षा से बड़ा होता है एक बच्चे का जीवन।आत्महत्या की दर पूरे भारत में विभिन्न स्तरों पर कई अलग अलग कारणों से भयावह तरीके से बढ़ रही है ,इसलिए राज्य स्तर पर नहीं केंद्र स्तर पर इसे युवा हितार्थ ,राष्ट्र हित में सोचते हुए शिक्षा नीति हो नहीं ,कार्यस्थल ,कारपोरेट जगत में कार्य जीवन संतुलन आदि हेतु हॉलिस्टिक प्रक्रिया उचित रूप से समावेश करने की सभी विभाग में इसे समायोजन करने की आवश्यकता है ।

क्या था पूरा मामला?

कोटा जिले के दीगोद क्षेत्र में गुरुवार को दसवीं की बोर्ड परीक्षा के दिन एक 16 वर्षीय छात्रा ने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या का प्रयास किया। परिजन उसे तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचे, बाद में न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां देर रात इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।परिवार के अनुसार छात्रा पिछले डेढ़ महीने से पढ़ाई को लेकर गंभीर मानसिक तनाव में थी और स्कूल भी नियमित नहीं जा रही थी। पिता ने केवल इतना कहा था कि परीक्षा दे दो, परिणाम की चिंता मत करना, लेकिन उसके भीतर चल रहा दबाव शब्दों में व्यक्त नहीं हो सका। घटना के दिन सुबह माता-पिता मजदूरी के लिए कोटा निकल गए थे। लगभग पौने दस बजे गांव से सूचना मिली कि बेटी ने फांसी लगा ली। भाई ने तुरंत उसे नीचे उतारकर अस्पताल पहुंचाया, पर डॉक्टर उसकी जान नहीं बचा सके। स्थानीय पुलिस के अनुसार पढ़ाई का तनाव प्रमुख कारण माना जा रहा है।कोटा में दसवीं की परीक्षा से ठीक पहले 16 वर्षीय छात्रा की आत्महत्या केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सिस्टम की चुप्पी पर बड़ा सवाल है। पढ़ाई का दबाव उतना घातक नहीं होता जितनी घातक होती है बच्चों के मन की अनसुनी। जब कोई बच्चा महीनों स्कूल नहीं जाता, पढ़ाई से दूर होता है और “मुझे नहीं पढ़ना” कहता है, तब यह जिद नहीं, चेतावनी होती है। क्या सरकारी स्कूलों में ऐसे संकेत पहचानने की कोई व्यवस्था है? क्या मानसिक काउंसलिंग केवल कोचिंग तक सीमित रहेगी? यह घटना सरकार से तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की मांग करती है—क्योंकि एक परीक्षा से बड़ा होता है एक बच्चे का जीवन।

🧠 आखिर क्यों टूट जाते हैं नाजुक मन?

भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (IIPS), मुंबई के एलुमनाई एवं ग्लोबल एन.एल.पी. लाइफ करियर कोच डॉ. नयन प्रकाश गांधी के अनुसार आत्महत्या कभी अचानक लिया गया निर्णय नहीं होती। यह लंबे समय से चल रहे मानसिक संघर्ष, असफलता के डर और भावनात्मक थकान का परिणाम होती है।इस मामले में चेतावनी संकेत स्पष्ट थे—

पढ़ाई में रुचि खत्म होना,लंबे समय तक स्कूल न जाना,“मुझे नहीं पढ़ना” एवं किशोरावस्था में बच्चे अत्यंत संवेदनशील होते हैं। उनकी सोच पूरी तरह परिपक्व नहीं होती और असफलता का भय उन्हें असहनीय लग सकता है। जब बच्चा यह महसूस करता है कि वह अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहा, तो अपराधबोध और हीनता की भावना गहराने लगती है।डॉ. गांधी बताते हैं कि एन.एल.पी NLP (न्यूरो-लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग) के माध्यम से सोच, भावनाओं और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। उनके अनुभव में बच्चों को सबसे अधिक आवश्यकता होती है -“बिना शर्त स्वीकृति” की। जहां स्वीकृति मिलती है, वहां आत्मघाती विचार कमजोर पड़ जाते हैं।

🫵 समाधान क्या? — माता-पिता, स्कूल और सरकार की साझा जिम्मेदारी

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए चेतावनी है।

👨‍👨‍👦‍👦 माता-पिता क्या करें?

👉बच्चे के व्यवहार में बदलाव को गंभीरता से लें

👉रोज संवाद करें, केवल निर्देश न दें

👉परिणाम से अधिक बच्चे को महत्व दें

👉निःशुल्क छात्र मानसिक परीक्षा तनाव ,करियर दबाव सबंधी काउंसलिग की हो अनिवार्यता 

🏢स्कूल और शिक्षा विभाग की भूमिका

☝️लंबे समय तक अनुपस्थित छात्रों पर अनिवार्य फॉलो-अप

☝️सरकारी स्कूलों में मनोवैज्ञानिक काउंसलर की नियुक्ति अनिवार्य हो

☝️कोचिंग ही नहीं, सरकारी स्कूलों में भी साप्ताहिक जीवन प्रबंधन,मानसिक तनाव नियंत्रण,करियर मार्गदर्शन,मोटिवेशनल वर्कशॉप अनिवार्य की जाए ।

डॉ. गांधी के अनुसार विभिन्न शोध बताते हैं कि परीक्षा-पूर्व तनाव प्रबंधन सत्र और नियमित काउंसलिंग से इस प्रकार की आत्महत्याओं को काफी हद तक रोका जा सकता है,जिससे प्रारंभिक अवस्था में ही तनाव ज्ञात होने पर उसका उचित समाधान किया जा सके । क्योंकि सच यही है,एक परीक्षा से बड़ा होता है एक बच्चे का जीवन,परंतु सरकार ,प्रशासन के बाद भी गांधी अहम भूमिका माता पिता की मानते है अतः गांव कस्बे स्तर पर माता पिता के लिए भी बच्चों के मानसिक तनाव को भांपने समझने हेतु ,बच्चों के साथ उचित व्यवहार ,तकनीकी समझ ,साइबर यौन अपराध आदि हेतु भी जागरूकता संबंधित प्रशिक्षण आवश्यक है ,जो सामाजिक संस्थाओं की भूमिका ,क्षेत्र विशेष में सक्रिय सोशल एक्टिविस्ट के सामाजिक प्रतिबद्धता से पूरा किया जा सकता है ।

भयावह हकीकत: क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े?

भारत में आत्महत्या की दर, विशेषकर छात्रों में, जनसंख्या वृद्धि की दर को भी पीछे छोड़ रही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की वार्षिक रिपोर्ट ‘Accidental Deaths & Suicides in India (ADSI)’ के अनुसार स्थिति चिंताजनक है

वर्षकुल आत्महत्याएं (भारत)छात्र आत्महत्याएंवृद्धि का रुझान (स्रोत: NCRB)
20211,64,03313,089कुल आत्महत्याओं में 7.2% की वृद्धि
20221,70,92413,044छात्र आत्महत्या दर में स्थिरता पर उच्च स्तर
20231,71,41813,892छात्र सुसाइड में पिछले वर्ष की तुलना में 6.5% की वृद्धि
20241,86,000*15,500*प्रक्षेपित डेटा (विभिन्न मीडिया व शोध विश्लेषण)
20251,94,000+18,000+अनुमानित (वर्तमान वृद्धि दर 9.5% के आधार पर)

महत्वपूर्ण तथ्य (स्रोत: NCRB 2023 रिपोर्ट):

  • पिछले एक दशक (2013-2023) में छात्र आत्महत्या के मामलों में 65% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। 
  • 2023 में कुल आत्महत्याओं में छात्रों की हिस्सेदारी 8.1% रही। 
  • आत्महत्या करने वालों में 66% लोग निम्न आय वर्ग (₹1 लाख वार्षिक से कम) के थे, जो आर्थिक अभाव और मानसिक दबाव के गहरे संबंध को दर्शाता है।

अतः यह स्वीकार करना आवश्यक है कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर देश के नेतृत्व की संवेदनशीलता पहले ही स्पष्ट हो चुकी है। नरेंद्र मोदी ने अनेक अवसरों पर मन की बात के माध्यम से विद्यार्थियों से सीधे संवाद किया है, उनके डर, तनाव और असफलता के भय को समझते हुए प्रेम, विश्वास और आत्मबल का संदेश दिया है। यही मानवीय चिंता अब केवल शब्दों तक सीमित न रहे, बल्कि राज्य-दर-राज्य ठोस नीतिगत कार्रवाई में बदले—यही समय की मांग है। डबल इंजन सरकार का दायित्व है कि वह सरकारी स्कूलों की पूरी श्रृंखला को मजबूत करे, ब्लॉक स्तर तक मनोवैज्ञानिक काउंसलर की नियमित भर्ती सुनिश्चित करे और स्कूलों को बच्चों के लिए सिर्फ शिक्षा का नहीं, बल्कि मानसिक सुरक्षा का भी केंद्र बनाए। जब केंद्र की भावना और राज्यों की कार्यवाही एक दिशा में चलेगी, तभी “मन की बात” वास्तव में हर बच्चे के मन तक पहुंचेगी और अनमोल जिंदगियां टूटने से बच सकेंगी।

Show More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button