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मुस्लिम वोट और सेक्युलर पार्टियों की सियासतः चुनावी जंग और बड़ा सवाल

-रितेश सिन्हा

हाल ही में रेवंत रेड्डी के बयान ने सियासी माहौल को गरमाया है कि “कांग्रेस है तो मुस्लिम का सम्मान है।” इसके बाद असदुद्दीन ओवैसी ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और जनता दल को सेक्युलर पार्टी होने के बावजूद मुसलमानों के प्रति कम हिस्सेदारी देने को लेकर कड़ी आलोचना की है। ये बयान सिर्फ बयान नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों की राजनीतिक रणनीति और मुस्लिम वोट बैंक की बंटवारे की एक बड़ी बहस की शुरुआत हैं। अब सवाल ये उठता है कि बिहार चुनावों के बाद, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों के आगामी चुनावों में मुस्लिम आबादी किस पार्टी के साथ रह पाएगी?

बिहार च चुनाव ने एक बार फिर से मुस्लिम वोट की ताकत और उसकी राजनीतिक अहमियत को साबित किया है। वहीं, कांग्रेस और अन्य सेक्युलर दलों को लेकर मुसलमानों की उम्मीदें भी बढ़ी हैं। लेकिन राजनीतिक समीकरणों में लगातार हो रहे बदलाव और नेताओं के बयान निशाने पर हैं। मुस्लिम वोट का बंटवारा इसलिए भी है क्योंकि कई पार्टियां उसे अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। बिहार के बाद उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम जैसे राज्यों में मुस्लिम वोट का समीकरण और भी जटिल हो जाता दिख रहा है।

ओवैसी ने कांग्रेस, सपा और राजद को मुसलमानों के प्रति कम हिस्सेदारी देने को लेकर कटाक्ष किया है। ओवैसी की पार्टी दक्षिण और उत्तर भारत में मुस्लिम वोट की नई राह बनाने की कोशिश कर रही है। ओवैसी की चुनौती केवल भाजपा के खिलाफ नहीं, बल्कि इसी मुस्लिम वोट को लेकर कांग्रेस और अन्य दलों को भी नकारात्मक संदेश दे रही है। इसका सीधा असर आगामी चुनावों पर पड़ेगा, जहां मुस्लिम मतदाता अपनी नई राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश में हैं।

सपा और बसपा-कांग्रेस गठबंधन उत्तर प्रदेश में भी मुस्लिम वोट की दुहाई में राजनीतिक धुरी स्पष्ट होती जा रही है। आजम खान और अखिलेश यादव की बीच विवाद खत्म कर सामंजस्य बिठाने के प्रयास इस बात को इंगित करते हैं कि मुस्लिम वोट के नुकसान को लेकर सारी पार्टियां चिंतित हैं। वहीं, बसपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की उड़ती खबरों के बीच सपा से दूरी बन रही है, जिससे मुस्लिम वोट की खिचड़ी और भी अधिक जटिल हो रही है।

वोट की सबसे बड़ी भागीदारी सपा और बसपा-कांग्रेस गठबंधन में बंटी हुई दिखती है। ओवैसी भी यहां अपनी पकड़ बनाने की कोशिश में हैं। ममता बनर्जी की पार्टी ने मुस्लिम वोट के लिए मजबूत छवि बनाई है, लेकिन कांग्रेस और वाम दलों के प्रयास भी चल रहे हैं। असम में भी मुस्लिम आबादी की राजनीतिक लुभावनी बढ़ रही है, भाजपा और अन्य दलों के बीच मुकाबला तेज है। तेलंगाना और कर्नाटक में एमआईएम की मौजूदगी से मुस्लिम वोट के दूसरे विकल्प उभर रहे हैं। केरल में भी मुस्लिम वोट के लिए कांग्रेस और अन्य दल लगातार मेहनत कर रही हैं जहां मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी स्वतंत्र और सशक्त है।

मुस्लिम वोट की राजनीति में कांग्रेस को अपने सेक्युलर तेवरों और विश्वास को मजबूत करना होगा। रेवंत रेड्डी के बयान की तर्ज पर अब कांग्रेस और उससे जुड़े सभी दलों को मुसलमानों के प्रति अपने असरदार नेतृत्व और नीति निर्माण पर ध्यान देना होगा। मुसलमानों की अपेक्षा केवल चुनावी फायदे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनका सम्मान और अधिकार सुनिश्चित होना चाहिए। कांग्रेस को यह समझना होगा कि मुस्लिम वोट बैंक केवल संख्या नहीं, बल्कि विश्वास की ज़रूरत है। मुस्लिम वोट को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीतियाँ और बयान जारी हैं, लेकिन असली समीकरण चुनावों की अटकलों से परे होता है। आगामी चुनावों में मुस्लिम आबादी का रहना किसके साथ है, इस पर देश की राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है। कांग्रेस, सपा और राजद जैसे सेक्युलर दलों को इस चुनावी सियासत में अपनी मजबूत पैठ बनाने के लिए मुस्लिम समुदाय की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा।

ओवैसी जैसे सियासी खिलाड़ी भी मुस्लिम वोट के साझा प्रभुत्व के लिए चुनौती पेश कर रहे हैं। यह राजनीतिक सफर अभी शुरू ही हुआ है, और आने वाला चुनाव इस दिशा में बड़ी परीक्षा बनेगा। बिहार चुनाव के नतीजों से तय होगा कि यूपी, असम, केरल, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल में मुस्लिम मतदाता तथाकथित सेकुलर दलों का गणित बिगाड़ंते हैं, या फिर नए विकल्प की तलाश में कुछ नया करने का प्रयास करते हैं। वैसे राजनीतिक पंडित अब मानने लगे हैं कि अगर भाजपा मुस्लिम आबादी के प्रति नरम रूख अपना लें तो सेकुलर दलों का तथाकथित मुस्लिम प्रेम पूरी तरह से बिखर सकता है। वहीं क्षेत्रीय दलों का वजूद भी कुछ राज्यों से कुछ जिलों तक सिमट कर रह जाएगा। वैसे ये भी कयास लगने लगे हैं कि नए परिसीमन के बाद भारत की सियासत भी बदलेगीह और राजनीतिक परिदृश्य भी।

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