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शतकवीर अटल! महामना मालवीय की परंपरा में सनातनी योद्धा

-एक युगद्रष्टा राजनेता का भारतीय राजनीति में अतुल्य योगदान
— रितेश सिन्हा

भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के उन शिखर पुरुषों में से थे, जिन्होंने कविता की कोमलता और राजनीति की कठोरता के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित कर एक नया आयाम गढ़ा। 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे वाजपेयी जी को ‘शतकवीर’ कहा जाता है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को एक सीमित संगठन से उठाकर राष्ट्रीय शक्ति-संतुलन के केंद्र में स्थापित किया।
वाजपेयी जी का योगदान केवल नीतिगत नहीं था, बल्कि वैचारिक, सामाजिक और सनातनी समन्वय का प्रतीक भी था। उनकी सनातनी दृष्टि पर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की गहरी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। मालवीय जी भारतीय राष्ट्रवाद की नींव रखने वाले महापुरुष थे। 1861 में इलाहाबाद में जन्मे महामना जी ने 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना कर सनातनी मूल्यों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ा। वेद–उपनिषद आधारित उनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हिंदू एकता, राष्ट्रीय गौरव और स्वदेशी भावना को सुदृढ़ करता था।
स्वराज्य पार्टी के संस्थापक के रूप में मालवीय जी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संवैधानिक संघर्ष किया। हिंदू महासभा के माध्यम से उन्होंने उदार सनातनी चेतना का प्रसार किया। यही वैचारिक विरासत अटल जी में परिलक्षित होती है—संतुलित राष्ट्रवाद, शिक्षा सुधार और समावेशी हिंदुत्व। वाजपेयी जी ने मालवीय जी की परंपरा को जीवंत किया। उनकी कविताओं और भाषणों में सनातनी दर्शन की झलक मिलती है। “भारत माता की जय” का उद्घोष मालवीय जी के स्वदेशी आह्वान की स्मृति दिलाता है। जहाँ मालवीय जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के माध्यम से सांस्कृतिक पुनर्जागरण किया, वहीं वाजपेयी जी ने राजनीतिक मंच से सनातन मूल्यों को राष्ट्रीय नीति में रूपांतरित किया। उनकी राजनीति संकीर्णता से परे, समावेशी और उदार थी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा लेकर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। 1950 के दशक में वे भारतीय जनसंघ के प्रमुख नेता बने और 1957 में पहली बार लोकसभा सदस्य चुने गए। उनकी वाक्पटुता और संसदीय स्पष्टता ने उन्हें विपक्ष का सशक्त स्तंभ बनाया। मालवीय जी की भांति वाजपेयी जी ने भी कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और सदैव राष्ट्रहित व सनातनी मूल्यों को सर्वोपरि रखा।
1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय वे इसके प्रथम अध्यक्ष बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने वैचारिक आधार प्रदान किया और वाजपेयी जी ने उसे राजनीतिक व्यावहारिकता दी—ठीक वैसे ही जैसे मालवीय जी ने स्वराज्य पार्टी के माध्यम से किया था। इस समन्वय से सनातनी मूल्य जन-जन तक पहुँचे। 1984 के लोकसभा चुनावों में मात्र दो सीटें मिलने के बावजूद उन्होंने हार को आत्ममंथन का अवसर बनाया।
1989 के राम मंदिर आंदोलन के दौरान संघ–भाजपा एकता और सुदृढ़ हुई। अयोध्या आंदोलन ने सनातनी चेतना को जागृत किया, किंतु वाजपेयी जी ने अतिवाद से दूर रहकर संतुलित राष्ट्रवाद का मार्ग चुना। गठबंधन राजनीति में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री रहते हुए उन्होंने पाकिस्तान और चीन के साथ संवाद की नीति अपनाई, जो सनातनी अहिंसा और सह-अस्तित्व की भावना पर आधारित थी।
1998 में उन्होंने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) का गठन कर विविध क्षेत्रीय दलों को साथ जोड़ा। 11 मई 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों ने भारत को परमाणु शक्ति बनाया—यह सनातनी स्वाभिमान और राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रतीक था। 1999 की कारगिल विजय ने उनके नेतृत्व को और सुदृढ़ किया। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति ने भारत के विकास को नई गति दी।
वाजपेयी युग ने नेहरू–इंदिरा काल की एकछत्रता के स्थान पर बहुलवादी लोकतंत्र को मजबूती दी। लाहौर बस यात्रा सनातनी सद्भाव और शांति का अनुपम उदाहरण बनी। 2004 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी वे लोकतंत्र के सजग प्रहरी बने रहे। उनकी कविताएँ सनातनी दर्शन की आत्मा को अभिव्यक्त करती हैं और मालवीय जी की उदार परंपरा अल्पसंख्यकों को भी आश्वस्त करती है।
शतकवीर अटल का शतक—“शतं जीवेत, शतं जरा।”
महामना मालवीय की वैचारिक छाया में अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय राजनीति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और भारतीय जनता पार्टी को वैश्विक पहचान दिलाई।

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