संवाद
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल,के कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाजसे जानिए,चीनी उत्पादों का बहिष्कार कैसे करें?
चीन की नीति भारत के प्रति सदैव प्रतिस्पर्धी और शत्रुतापूर्ण रही है। चीन भारत का स्थाई शत्रु है।


चीन की नीति भारत के प्रति सदैव प्रतिस्पर्धी और शत्रुतापूर्ण रही है। चीन भारत का स्थाई शत्रु है। चीनी क्रांति के बाद से ही चीन ने भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत-चीन सीमा पर और घर-परिवार और समाज के स्तर पर घेरने और परेशान करने की नीति पर ही कार्य किया है। भारत के प्रति चीन तीन रणनीतियों के साथ निरन्तर कूटनीतिक घेराबन्दी करता ही रहा है। प्रथम स्तर मनोवैज्ञानिक युद्द (phycological warfare) द्वितीय स्तर मीडिया छल योजना (media miniculation) का है और तृतीय स्तर कानूनी छल कार्यक्रम (legal minimization) का है। कोरोना संकट काल में चीन ने गलवान घाटी में अनैतिक हस्तक्षेप किया है और भारत के घर में अर्थात् परिवार, समाज और राष्ट्रीय स्तर पर चीनी उत्पादों के माध्यम से अपने प्रभाव क्षेत्र के विस्तार के साथ-साथ चीनी उत्पादों में भारत की निर्भरता को अभिवृद्ध किया है। यह सब कैसे होता गया, गम्भीरतापूर्वक जानना जरूरी है।
चीन जो माओ से-तुंग और चाऊ एन लाई के युग में विश्व के विकसित राष्ट्रों से विज्ञान, तकनीकी और औद्योगिकीकरण के क्षेत्र में 20 वर्ष पीछे था तथा कृषि और कृषि के उत्पादों में 40 से 50 वर्ष पीछे था। वही पिछड़ा हुआ चीन आज आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से न सिर्फ सशक्त और आत्मनिर्भर हुआ अपितु आज चीन औद्योगिक उत्पादन में विश्व में चौथे स्थान पर तथा जीएनपी की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है। इतना ही नहीं आज विकसित और विकासशील राष्ट्रों की निर्भरता चीनी उत्पादों पर बढ़ गई है। यह सब कैसे हुआ? इसका श्रेय देंग शियाओ पिंग की उदारीकरण और खुले द्वार की नीति को जाता है।
भारत में नेहरू युग से लेकर वर्तमान तक अनेक प्रयास हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत अभियान आरम्भ किया है। आगामी कुछ दशकों में भारत विविध क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होगा तथा ‘लोकल टू वोकल’ और ‘लोकल टू गलोबल’ की यात्रा तय कर विश्व में और अधिक सम्मान पाएगा, इसमें सन्देह नहीं है। परन्तु चीन की विकास योजनाओं और उनका धरातल पर व्यापक स्वरूप को गम्भीरता से विष्लेषण कर भारतीय हितों के अनुरूप समझना चाहिए।
चीन के विरुद्ध विश्व भावना ::
आज सम्पूर्ण दुनिया चीन के उत्पादों पर निर्भर है और चीन ने विश्व व्यापार को अधिकाधिक स्तर पर अपनी गिरफ्त में ले लिया है। चीनी उत्पादों की मांग अधिक है यद्द्पि ये सस्ते मिलते हैं और जल्दी खराब भी होते हैं औऱ प्रायः सुधारे नहीं जा सकते। उपयोग करने के बाद इन्हें फेकना होता है। परन्तु ये चीनी उत्पाद एक वर्ग विशेष की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है। इसी कारण चीन ने दूसरे देशों के बाजार पर आधिपत्य स्थापित कर रखा है।
कोरोना महामारी के समय चीन का वास्तविक स्वरूप समझ में आ रहा है। चीन की विस्तारवादी नीति और एकाधिकारवादी मानसिकता ने पूरे विश्व पर अपनी शर्तों पर प्रभुत्व स्थापित करता जा रहा है। पूरा विश्व चीन को नियंत्रित करने और इसका विकल्प खोजने में लगा है। चीन के उत्पादों ने भारतीय समाज और घर परिवार को पूरी तरह जकड़ रखा है। भारत के परिवारों और बाजारों में दैनिक उपभोग की वस्तुओं से लेकर स्थाई प्रयोग की वस्तुएं जैसे कि रसोई घर, बेडरूम में एयर कंडीशनिंग मशीनों की शक्ल में, मोबाइल फोन और डिजिटल वैलेट के रूप में चीन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। चीन ने भारत में छह अरब डॉलर से भी ज़्यादा का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कर रखा है जबकि एशिया के एक सनी देश पाकिस्तान में चीन का निवेश 30 अरब डॉलर से भी ज़्यादा का है। मुंबई के विदेशी मामलों के थिंक टैंक ‘गेटवे हाउस’ ने भारत में ऐसी 75 कंपनियों की पहचान की है जो ई-कॉमर्स, फिनटेक, मीडिया/सोशल मीडिया, एग्रीगेशन सर्विस और लॉजिस्टिक्स जैसी सेवाओं में हैं और उनमें चीन का निवेश है।
क्यूआर कोड भुगतान के लिए वैश्विक उद्योग मानक के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। यहां तक कि भारत में चीनी स्मार्टफोन 50 फीसदी बाजार हिस्सेदारी के साथ बड़े पैमाने पर छाए हुए हैं। चीन की सर्वोच्च ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा दरअसल अमेजन और ईबे का एक संकर या मिश्रण (हाइब्रिड) थी। वहीं, गूगल को कड़ी टक्कर देने के लिए चीन ने अपना सर्च इंजन बैदू लांच किया।
आजकल भारत में चीन के विरूद्ध एक वतावरण बहस तेज है। सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, विभिन्न न्यूज चैनल और विभिन्न प्रचार माध्यमों के द्वारा चीनी वस्तुओं एवं उत्पादनों का बहिष्कार किए जाने के विचार एवं प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। विभिन्न राष्ट्रवादी स्वयंसेवी संगठनों द्वारा चीन के विरुद्ध एक अभियान छेड़ दिया गया है और चीनी उत्पादनों के बहिष्कार का आग्रह किया जा रहा है। परंपरागत तरीके से खुदरा कारोबार करने वाले व्यापारियों के मंच Confederation of All India Traders (CAIT) कन्फेडरशन ऑफ़ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का एक राष्ट्रीय अभियान ” भारतीय सामान -हमारा अभियान” की शुरूआत की। इसके तहत व्यापारी संगठन ने दिसम्बर 2021 तक चीन में निर्मित वस्तुओं के भारत में आयात को 1 लाख करोड़ कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इनके अतिरिक्त भारत एवं चीन के मध्य अनेक क्षेत्र हैं जिनपर चीन के उत्पादों के बहिष्कार का प्रत्यक्ष प्रभाव भारत पर पड़ेगा। उदाहरण के लिए दवा उद्योग, रसायन उद्योग, ऑटो उद्योग, मोबाइल फ़ोन उद्योग, दूरसंचार उद्योग इत्यादि है। परन्तु यहां यह विचारणीय है कि क्या भारत चीनी उत्पादों का बॉयकॉट तत्काल कर सकता है?क्या किसी राष्ट्र द्वारा अन्य राष्ट्र का बहिष्कार अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत किया जाना सम्भव है? क्या चीनी उत्पादों का बायकॉट करना भारतीयों के लिए आसान विकल्प है? बहिष्कार कितना सरल और कितना कठिन है? क्या उत्पादों का बहिष्कार भारतीय अर्थव्यवस्था की दृष्टि से कितना अनुकूल और कितना प्रतिकूल होगा? क्या भारत के पास बहिष्कार के अतरिक्त कोई अन्य विकल्प है? भारत के पास अभी चीनी उत्पादों के तात्कालिक विकल्प और दूरगामी विकल्प क्या हैं ? क्या सम्भावनाएं है? इन सभी पर औऱ ऐसे ही मिलते-जुलते विषयों पर समीक्षात्मक विमर्श लिया जाना जरूरी है। प्रस्तुत आलेख में ऐसी ही विवेचना का प्रयास किया गया है।

भारत की दीर्घकालिक योजना ::
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की “आत्मनिर्भर भारत” अभियान ने भारत में स्वदेशी और नवीन जुनून के साथ प्रखर राष्ट्रवाद की एक नई दिशा निर्धारित की है। सम्पूर्ण भारत में चीनी सामानों के बहिष्कार की तरह-तरह की अपीलें की जा रहीं है, संकल्प लिए जा रहे हैं। यह एक ऐसा आव्हान है जो राष्ट्रवाद के नैरेटिव को मजबूत करता है और स्वदेशी की अवधारणा को बल देता है। परन्तु कहीं-कहीं ऐसे स्वर सुनाई देते हैं कि ये एक राजनीतिक दल विशेष के एजेंडे के अंतर्गत हो रहा है। परन्तु विचार करे कि क्या राष्ट्रत्व के भाव और स्वदेशी उत्पादों पर स्वाभिमान होना, आत्मनिर्भर औऱ ऐसे शक्ति सम्पन्न राष्ट्र की परिकल्पना को साकार स्वरूप प्रदान किए जाने के लिए नागरिकों में साहस,आत्मबल और विश्वास को जागृत करने का एजेंडा भी यदि किसी दल द्वारा चलाया जा रहा है तो इसमें परेशान होना, आलोचना करना और उपहास की मुद्रा में अभिव्यक्त होना किस श्रेणी में आता है विवेचना करने का विषय नहीं है। परन्तु यह तो गम्भीरतापूर्वक विमर्श करना ही होगा कि क्या भारत अभी तत्काल किस स्थिति में है? चीन पर भारतीय बाजार की निर्भरता कितनी और किस प्रकार की है? क्या एक साथ ही एक वार में चीनी निर्भरता समाप्त होगी अथवा चरनबद्ध तरीकों से सम्भव होगा। यह कार्य कठिन तो अवश्य है पर असम्भव नहीं ऐसा आज भारत का प्रत्येक उत्पादक व्यक्ति, व्यापार के घराने और आम भारतीय सोच रहा है। संकल्प भी लिया है। संक्षेप में हम सभी को यह जानना जरूरी है कि चीन पर भारत की निर्भरता किन-किन क्षेत्रों में है और किस तरह चीनी उत्पादों का बहिष्कार किया जा सकता है। अतः विचारणीय है कि क्या चीनी उत्पादों का बॉयकॉट अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत किया जा सकता है? क्या चीनी उत्पादों का बायकॉट करना भारतीयों के लिए कितना कठिन है? क्या उत्पादों का बहिष्कार भारतीय अर्थव्यवस्था की दृष्टि से कितना अनुकूल कितना प्रतिकूल होगा?
आर्थिक यथार्थ तो यह है कि विगत वर्ष 2019 में भारत ने चीन से 75 अरब डॉलर मूल्य का सामान आयात किया लेकिन यह चीनी निर्यात का सिर्फ 3 प्रतिशत है। दूसरी ओर, उसी दौरान भारत ने चीन को 17 अरब डॉलर मूल्य के सामान का निर्यात किया और यह भारतीय निर्यात का 5.3 प्रतिशत है। यानी दोनों देशों ने एक दूसरे का सामान लेना बंद कर दिया तो जितना नुक़सान चीन को होगा, उसके अनुपात में भारत को लगभग दुगुना नुक़सान होगा।
भारतीय उद्योगों की चीन पर निर्भरता ::
भारत चीन से खिलौने, बिजली का लैंप, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद, कंप्यूटर के पार्ट्स, मोटर गाड़ी और मोटर साइकिल के कल पुर्जे, उर्वरक, एंटीबायोटिक्स, दवाएं व मोबाइल फ़ोन खरीदता है।इलेक्ट्रॉनिक्स, मोटर कार, मोटर साइकिल, मोबाइल फ़ोन, उवर्रक व दवा उद्योग पूरी तरह चीनी आयात पर निर्भर है। चीन से भारत इंटरमीडिएट प्रोडक्ट्स लेता है, अर्थात ऐसे उत्पाद जिनके आधार पर भारत कोई दूसरा नया उत्पाद तैयार होता है। इनमें दवाइयां और वाहन प्रमुख हैं। इसके अलावा मोबाइल और कंप्यूटर उद्योग तो मोटे तौर पर चीनी कल-पुर्जों को जोड़ कर नया उत्पाद बनाने तक सीमित है। इन चीनी कल-पुर्जों के अलावा ये उद्योग पूरी तरह एक झटके में बंद हो जाएंगे।
बहिष्कार का भारतीय उद्योग पर प्रभाव ::
भारत एवं चीन के मध्य अनेक क्षेत्र है जिनका प्रत्यक्ष प्रभाव भारत पर पड़ेगा। उदाहरण के लिए दवा उद्योग, रसायन उद्योग, ऑटो उद्योग, मोबाइल फ़ोन उद्योग, दूरसंचार उद्योग इत्यादि।
(1) दवा उद्योग– दवा बनाने के लिए एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इनग्रेडियंट्स (एपीआई) की ज़रूरत पड़ती है। इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि क्रोसिन दवा की एपीआई पैरासेटामॉल है। भारतीय नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत ने दवा उद्योग के कुछ प्रमुख लोगों की एक बैठक बुलाई। इस बैठक का फोकस यह था कि आत्मनिर्भर बनने के लिए भारतीय दवा उद्योग की चीन पर निर्भरता ख़त्म की जाए। केंद्र सरकार की संस्था सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन ने एक रिपोर्ट में कहा है कि भारतीय दवा उद्योग को चीन पर निर्भरता ख़त्म करने के लिए कम से कम 38 एपीआई ख़ुद बनाने होंगे या किसी और से लेना होगा। यह फ़िलहाल मुमकिन नहीं है। न तो इसके लिए भारत के पास प्रौद्योगिकी है, न पूंजी और न ही पेंटेट्स राइट्स। ये एपीआई लंबे शोध के बाद विकसित हुए हैं, यूं ही कोई नहीं बना सकता।
तथ्य तो यह है कि 70% थोक दवाइयां चीन से आती हैं। भारत के एंटीबायोटिक्स उत्पाद चीन पर आधारित हैं। पेनसिलिन, एम्पीसिलिन, अमॉक्सीसिलिन, टेट्रासाइक्लिन, विटामिन और हार्मोन ड्रग्स चीन से ही आते हैं। इसका कोई विकल्प नहीं है। भारत ये चीजें यूरोपीय देशों से नहीं ले सकता, वह आर्थिक रूप से मुमकिन नहीं है। ख़ुद यूरोपीय दवा निर्माता ये चीजें चीन से लेते हैं।थोक दवाओं का 70 प्रतिशत हिस्सा चीन से आता है। भारत ने बीते साल 2.4 अरब डॉलर की बल्क दवाएं और दवाओं के इंटरमीडिएट चीन से खरीदा।
(2) रसायन उद्योग—आज भारत का 163 अरब डॉलर का रसायन उद्योग लॉकडाउन की वजह से चीन से इंटरमीडिएट प्रोडक्ट्स न आने से त्राहि-त्राहि कर रहा है। रसायन उद्योग की शीर्ष संस्था केमेक्सिल के पूर्व अध्यक्ष सतीश वाग ने कहा है कि इंटरमीडिएट प्रोडक्टस के लिए चीन पर निर्भरता ख़त्म नहीं की जा सकती है। भारत का रसायन उद्योग 80 हज़ार उत्पाद बनाता है जो यूरोपीय संघ के देश, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान देशों को निर्यात किया जाता है। लॉकडाउन के दौरान पूरा उद्योग ठप हो गया। रसायन उद्योग का 2025 तक 304 अरब डॉलर के कारोबार का लक्ष्य था, जो अब नामुमकिन है। सवाल यह है कि जब सिर्फ लॉकडाउन से यह हुआ तो चीन से एकदम सामान न लें, यह कैसे मुमकिन है?
(3) ऑटो उद्योग– भारत की ऑटो कंपनियाँ लगभग 30 प्रतिशत कल-पुर्जे चीन से खरीदती हैं। ब्रेकिंग सिस्टम, स्टीयरिंग सिस्टम, इल्यूमिनेशन सिस्टम और इंजिन चीन से आयात किए जाते हैं। वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान चीन से 4.50 अरब डॉलर के कल-पुर्जे खरीदे गए। चीन पर यह निर्भरता और बढ़ जाएगी क्योंकि भारत बीएस 4 से बीएस 6 एमिशन सिस्टम अपनाने जा रहा है। सवाल उठता है कि भारतीय ऑटो कंपनियाँ कहां से ये कल-पुर्जे खरीदें?
(4) मोबाइल फ़ोन उद्योग– भारत का मोबाइल फ़ोन उद्योग पूरी तरह चीन पर निर्भर रहता है। चीन से ये सारे कल-पुर्जे अलग-अलग कर आयात किये जाते हैं। ऐसे सेट लगभग 75 प्रतिशत होते हैं। शेष 25 प्रतिशत सेट एसकेडी यानी सेमी नॉकडाउन कंडीशन में होते हैं। भारत में सिर्फ उसकी असेम्बलिंग होती है, यानी उन कल-पुर्जों को जोड़ कर सेट तैयार कर दिया जाता है। भारत ने 2018 में 13 अरब डॉलर के मोबाइल फ़ोन कल-पुर्जे खरीदे थे। काउंटर प्वाइंट रिसर्च के एसोसिएट डाइरेक्टर तरुण पाठक ने कहा कि भारत में बनने वाले इन मोबाइल फ़ोन सेट का सिर्फ 17 प्रतिशत हिस्सा भारतीय होता है।
कोरोना काल में लॉकडाउन के कारण मोबाइल फ़ोन उद्योग की हालत चिंतनीय हो गई है। कुछ लोगो का तर्क है कि भारत की चीन से निर्भरता को समाप्त नहीं किया जा सकता और यदि चीनी निर्भरता से मुक्त होना है तो कैसे? एक अध्ययन में पाया गया था कि सिर्फ लॉकडाउन की वजह से चीन से आयात न होने की स्थिति में ऐपल और फ़ॉक्सकॉन जैसी बड़ी कंपनियों से लेकर छोटे-मोटे काम करने वाली कंपनियों पर बुरा असर पड़ेगा। इससे नौकरियाँ जाएंगी, आयात-निर्यात कम होंगे और सरकार को कर के रूप में पहले से कम पैसे मिलेंगे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि चीन में बनने वाले उपकरण की कमी होगी। मोबाइल फ़ोन और टेलीविज़न सेट्स जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों तक की कमी भारत में देखी जाएगी। शियोमी, वोवो, ओप्पो, वन प्लस, लीनोवो, ऐपल, रीयलमी के उपकरणों की आपूर्ति कम होगी। टीसीएल और लीनोवो जैसी बड़ी कंपनियों के उत्पाद भी कम होंगे। यह तो सिर्फ लॉकडाउन के असर की बात हो रही है। चीन का बॉयकॉट करने पर क्या असर होगा, यह अनुमान लगाया जा सकता है।
(5) दूरसंचार उद्योग– भारत का दूरसंचार यानी टेलीकॉम उद्योग पूरी तरह चीनी उपकरणों और कल पुर्जो पर निर्भर है। हम सिर्फ दो कंपनियों पर ध्यान देते हैं। चीनी कंपनी ह्वाबे और ज़ेडटीई ने 1998-99 में भारत में अपना कारोबार शुरू किया। साल 2005-2006 आते-आते ये दोनों कंपनियाँ भारतीय टेलीकॉम उद्योग की रीढ़ की हड्डी बन गईं। बीएसएनल, एमटीएनएल और आईटीआई के ज़्यादातर उपकरण इन दो कंपनियों से ही आते हैं। टेलीकॉम सेवा देने वाली कंपनियों में आइडिया सेल्युलर, एअरसेल, रिलायंस कम्युनिकेशन्स, टाटा टेलीसर्विसेज पूरी तरह ह्वाबे और जेडटीई पर निर्भर हैं। इसके अलावा टाटा एलक्सी, एचसीएल टेक, इनफ़ोसिस, श्याम टेलीकॉम, इनवेंटम, मैट्रिक्स टेलीकॉम, सीडॉट विहान और दूसरी कंपनियाँ इनके ग्राहक हैं। तो यह साफ़ है कि चीन से पूरी तरह संपर्क काटने का मतलब है कि ये तमाम उद्योग पूरी तरह चौपट हो जाएंगे।
विकल्पों की तलाश ::
क्या चीन से आयातित ये उत्पाद हम दूसरे देश से ले सकते हैं ? ले सकते है परन्तु कठिनाई यह है कि चीन के बाहर ये उत्पाद मुख्य रूप से यूरोपीय बाज़ार में मिलते हैं, मसलन, जर्मनी से ऑटो पार्ट्स। लेकिन ये बहुत ही महंगे होते हैं। इन देशों से कुछ सामान खरीदने से उसकी लागत बहुत अधिक हो जाएगी और विश्व बाज़ार में भारत उसे नहीं बेच पाएगा। घरेलू बाज़ार में उनकी कीमत बढ़ने से मंहगाई बढ़ेगी और लोगों की जेब पर बोझ बढ़ेगा। कुछ उत्पाद वियतनाम, ताइवान या दक्षिण कोरिया से खरीदे जा सकते हैं। पर इन देशों की उत्पादन क्षमता कम है और वे भारत की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकते।
भारत बहुत सारे सामानों का आयात चीन से करता है। इस समय कोरोना वायरस के चलते चीन में बहुत सारी चीजों की फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं, जिसके चलते भारत में उन सामानों का आयात नहीं हो पा रहा है। इसके चलते भारत ने अब इन चीजों के लिए चीन का विकल्प ढूंढना शुरू कर दिया है। केंद्र सरकार टेक्सटाइल फैब्रिक, रेफ्रीजिरेटर और सूटकेस से लेकर एमोक्सिसिलिन एरिथ्रोमाइसिन और मेट्रोनिडाजोल जैसे एंटीबायोटिक्स, विटामिन और कीटनाशक सहित 1050 सामानों के लिए चीन का ऑप्शन ढूंढ रही है। सरकार पूरी दुनिया से इन सामानों की आपूर्ति करने पर ध्यान दे रही है। भारत चीन से बड़ी मात्रा में आयात करता है, जो कोरोना वायरस की वजह से प्रभावित हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय नियम क्या हैं?::
प्रश्न यह भी उठता है कि क्या भारत चीनी उत्पादों पर नियंत्रण लगा सकता है? कोई भी देश अन्य दूसरे देशों पर स्वमेव इस प्रकार के प्रतिबंध नहीं लगा सकता। विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुसार युद्ध की स्थिति और कूटनयिक संबंध नहीं होने पर भी किसी देश के आयात को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है। परन्तु भारत चीनी उत्पादों पर अतिरिक्त आयात कर, एंटी-डंपिंग टैक्स और काउंटरवेलिंग टैक्स लगा सकता है। लेकिन एंटी-डंपिंग टैक्स और काउंरवेलिंग टैक्स लगाने से चीन उसे डब्लूटीओ में चुनौती दे सकता है। अतः ऐसी स्थिति में सिर्फ अतिरिक्त आयात कर ही ऐसी चीज है जो भारत किसी बहाने लाद सकता है। लेकिन ऐसा होने पर चीन भी भारतीय उत्पादों पर भी ऐसे ही दबाव लागू कर सकता है।
भारतीय निर्यात? ::
भारत चीन को कृषि उत्पाद, कॉटन टेक्सटाइल्स, कच्चा शीशा, लौह अयस्क, स्टील, ताँबा, हीरे और दूसरे कई तरह के कैपिटल गुड्स को निर्यात करता है। इस प्रकार इन उद्योगों को कठिनाइयों का सामना करना होगा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को आघात लगने की पूरी-पूरी सम्भावनाएं है। इस प्रक्रिया में चीन से ज़्यादा क्षति भारत को होगी। इससे लाखों लोग बेरोज़गार हो जाएंगे और अरबों डॉलर का नुक़सान भी होगा? अभी तत्काल चीनी उत्पादों का बहिष्कार कठिन है ही, परन्तु यदि हम भारतीय सोच लें, संकल्प कर लें तो शनैः शनैः स्थिति निश्चिततौर पर पलट जाएगी। क्या सोशल मीडिया पर चीनी मोबाइल फोन से चीनी उत्पादों के बॉयकॉट की अपील करने वाले की निरन्तर वृद्धि हो रही है। भारत में चीनी विरोध का एक वातावरण निर्मित हुआ है। परन्तु हमें विचार करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध और राजनीति सिर्फ भावनाओं से नहीं चलती। यथार्थ की इसमें माहिती भूमिका होती है।
चीन की भारत को धमकी ::
चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने भारत को आगाह किया है कि भारत अपनी घरेलू समस्याओं पर ध्यान दे और गुटनिरपेक्षता की अपनी पुरानी नीति पर चले और अमेरिका से दूरी बनाए रखे। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने कहा था कि चीन और भारत की तरफ से सीमा पर तनाव घटाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं।
सीमा पर तनाव कम होने से दोनों देशों को आर्थिक और व्यापार के ज्यादा मौके मिलेंगे जो दोनों देशों के हित में होगा। परन्तु यदि तनाव बढ़ता है और संघर्ष का रूप ले लेता है तो फिर भारत-चीन के संबंधों के लिए बहुत कम गुंजाइश बचेगी। भारत में चीन विरोधी भावनाओं के उभार को देखते हुए राजनीति का असर द्विपक्षीय व्यापार पर भी पड़ेगा। आज वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवस्था अधिक जटिल हो चुकी है। चीन-अमेरिका एक नए शीत युद्ध की तरफ आगे बढ़ रहे हैं, दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया और भारत में एक नई रणनीतिक साझेदारी बन गई है।
क्योंकि भारत ने लंबे समय से अपनी विदेश नीति में गुट निरपेक्षता की नीति का पालन किया है। ये देखना होगा कि भारत अपनी कूटनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखता है या फिर बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच अमेरिका के नेतृत्व वाले गुट की तरफ झुक जाता है। लेकिन अगर भारत चीन के खिलाफ अमेरिका के साथ शामिल हो जाता है तो वह अपने हितों की सुरक्षा करने में नहीं हिचकेगा। फिर ये हित चाहे राजनीतिक हों या आर्थिक। भारत अगर चीन की दोस्ती खो देता है तो उसे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी जिसे बर्दाश्त करना भी भारत के लिए मुश्किल होगा। चीन का यह कथन उनके व्यापारिक हितों के प्रभावित होने के कारण है परन्तु भारत को विकल्प तो तलाशने ही होंगे और वह विकल्प सिर्फ आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ने में ही है।
कैट द्वारा चीनी माल के बहिष्कार का संकल्प ::
परंपरागत तरीके से खुदरा कारोबार करने वाले व्यापारियों के मंच Confederation of All India Traders (CAIT) कन्फेडरशन ऑफ़ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का एक राष्ट्रीय अभियान ” भारतीय सामान -हमारा अभिमान” की शुरूआत की। इसके तहत व्यापारी संगठन ने दिसम्बर 2021 तक चीन में निर्मित वस्तुओं के भारत में आयात को 1 लाख करोड़ कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। CAIT ने रेल में खानपान के दौरान चाय और पानी पीने के लिए एक फेस मास्क और एक ग्लास जारी किया, जिस पर CAIT के अभियान के संदेश को उकेरा गया है और कहा गया है कि व्यापारी इस मास्क को पहनकर इस अभियान को बढ़ावा देंगे। दूसरी ओर, दिसंबर 2020 तक सभी राजधानी और शताब्दी ट्रेनों में खानपान के उद्देश्य के लिए लगभग 5 करोड़ गिलास वितरित किए जाएंगे। यह अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के ” लोकल पर वोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” के आह्वान को सफल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कोरोना महामारी जिसके कारण भारत एवं विश्व की अर्थव्यवस्था बिगड़ गई है इसको लेकर देश भर के नागरिकों में चीन के प्रति गहरा रोष है और लोग अब चीनी वस्तुओं से कतराने लगे हैं। इस अभियान के प्रथम चरण में कैट ने ऐसी 3000 वस्तुओं की सूची बनाई है जो वर्तमान में चीन से आयात होती हैं और जिनका उत्पादन भारत में भी एक लम्बे समय से होता आया है। कैट अपने इस अभियान के अंतर्गत देशभर में व्यापारियों एवं लोगों को जागरूक करेगा की चीनी वस्तुओं की बजाय भारतीय उत्पाद ही बेचे और ख़रीदे जाएँ। चीन से भारत का सालाना आयात करीब 70 अरब डालर (करीब पांच हजार अरब रुपए) का है।
कनफेडेरशन ऑफ़ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) द्वारा चीनी सामान के बहिष्कार और भारतीय सामान के उपयोग को बढ़ावा देने के अपने राष्ट्रीय अभियान “भारतीय सामान – हमारा अभिमान ” के अंतर्गत आज 500 से अधिक वस्तुओं की बृहद सूची जारी की जिनके बहिष्कार का आव्हान कैट ने अपने अभियान के प्रथम चरण में किया है। इन चीनी उत्पादों के बहिष्कार का आव्हान कर कैट ने दिसम्बर 2021 तक भारत द्वारा चीन से आयात में 13 बिलियन डॉलर जो लगभग एक लाख करोड़ रुपए होता है, की कमी करने का लक्ष्य रखा है।
कैट की इस सूची में रोज़मर्रा में काम आने वाली वस्तुएं, खिलौने, फर्निशिंग फैब्रिक, टेक्सटाइल, बिल्डर हार्डवेयर, फुटवियर, गारमेंट, किचन का सामान, लगेज, हैंड बैग, कॉस्मेटिक्स, गिफ्ट आइटम, इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स, फैशन अपैरल, खाद्यान, घड़ियाँ, जैम एवं ज्वेलरी, वस्त्र, स्टेशनरी, कागज़, घरेलू वस्तुएं, फर्नीचर, लाइटिंग, हेल्थ प्रोडक्ट्स, पैकेजिंग प्रोडक्ट, ऑटो पार्ट्स, यार्न, फेंगशुई आइटम्स, दिवाली एवं होली का सामान, चश्में, टेपेस्ट्री मैटेरियल आदि शामिल हैं
भारत-चीन और ‘मोबाइल मैनुफैक्चरिंग ::
भारत में मोबाइल फोन का आयात, निर्यात से अधिक रहा है। लेकिन वित्त वर्ष 2019-20 में भारत ने 4 करोड़ 15 लाख फोन निर्यात किए तो 56 लाख फोन आयात किए। यानि भारत ने 3 करोड़ 60 लाख यूनिट का निर्यात किया। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि भारत को वो मेक इन इंडिया के अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट का हब बनाने जा रहे हैं। पूरी दुनिया में 198 देश मोबाइल फोन का आयात करते हैं। अब तक निर्यात करने में चीन और वियतना का वर्चस्व रहा करता था। लेकिन अब भारत भी इस कड़ी में जुड़ गया है। भारत में चीनी निवेश पर चीन के बहिष्कार का विकल्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया है। वह है स्वयं को एटीएम निर्भर बनाना। मोदी ने स्वयं आत्मनिर्भरता हासिल करने का नारा बुलंद किया है। ‘लोकल के लिए वोकल’ प्रधानमंत्री मोदी जी का वह मंत्र और रणनीति है जो इन परिस्थितियों में भी भारत को सुदृढ़ बनाएगी। इस मन्त्र के परिणामस्वरूप भले ही फ़्लिपकार्ट और अमेज़न ने भारत में बनी चीज़ों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया हो लेकिन हमें अभी यह भी देखना होगा कि कारोबार जगत की मनः स्थिति कैसी है? क्या वह अभी पूरी तरह चीन के विरोध और आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी उत्पादों की आधारशिला पर खड़े हुए भारत को कैसे देख रहे हैं।
भारत में चीनी उत्पादों की प्रचुरता:
भारत के घर-परिवार से लेकर बाजारों में दैनिक उपभोग की वस्तुओं से लेकर स्थाई प्रयोग की वस्तुएं जैसे कि रसोई घर, बेडरूम में एयर कंडीशनिंग मशीनों की शक्ल में, मोबाइल फोन और डिजिटल वैलेट के रूप में चीन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। चीन ने भारत में छह अरब डॉलर से भी ज़्यादा का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कर रखा है जब कि पाकिस्तान में उसका निवेश 30 अरब डॉलर से भी ज़्यादा का है। भारतीय विदेशी मामलों के थिंक टैंक ‘गेटवे हाउस’ द्वारा भारत में ऐसी 75 कंपनियों की पहचान की है जो ई-कॉमर्स, फिनटेक, मीडिया/सोशल मीडिया, एग्रीगेशन सर्विस और लॉजिस्टिक्स जैसी सेवाओं में हैं और उनमें चीन का निवेश है।
यूनिकॉर्न में चीन की हिस्सेदारी ::
थिंक टैंक गेटवे हाउस की रिपोर्ट के अनुसार यूनिकॉर्न क्लब में शामिल भारत के 30 में से 18 स्टार्टअप में चीन का पैसा लगा है। यूनिकॉर्न क्लब में वो startups होते हैं जिनका market value 1 बिलियन डॉलर से अधिक होता है।
चीनी कंपनियों के भारतीय स्टार्टअप में इन्वेस्ट करने की तीन वजह हैं। पहली- देश की कोई बड़ी कंपनी या ग्रुप स्टार्टअप में इन्वेस्ट नहीं करते। दूसरा- जब कोई स्टार्टअप घाटे में जाता है, तो चीनी कंपनियां उसमें हिस्सेदारी खरीद लेती हैं और उसे सपोर्ट करती हैं।तीसरा- भारत का बड़ा मार्केट।
गेटवे हाउस के मुताबिक, चीन की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा, टिकटॉक बनाने वाली बाइटडांस और टेक कंपनी टेन्सेंट ही भारत के 92 स्टार्टअप को फंडिंग करती हैं। इनमें पेटीएम, फ्लिपकार्ट, बायजू, ओला और ओयो जैसे स्टार्टअप भी शामिल हैं। तकनीकी क्षेत्र में निवेश की प्रकृति के कारण चीन ने भारत पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया है। उदाहरण के लिए, बाइटडांस, टिकटॉक की मूल कंपनी है, जो चीन की है और यह यूट्यूब के मुक़ाबले भारत में काफ़ी लोकप्रिय है। चीन की रिसर्च फर्म हुरुन ने अपने रिसर्च में भारतीय अमीरों के निवेश की आदतों को लेकर भी जानकारी दी है, जिसके अनुसार भारतीय सुपररिच निवेश करते समय जोखिम लेना पसंद नहीं करते हैं।
हुरून रिसर्च इंस्टिट्यूट ने 2019 में प्रथम हुरून ग्लोबल यूनिकॉर्न लिस्ट जारी की। इस रैंकिंग में विश्व के बिलियन डॉलर टेक्नोलॉजी स्टार्टअप्स को शामिल किया गया है। इस रैंकिंग में चीन पहले स्थान पर है, चीन के 206 यूनिकॉर्न हैं, चीन के बाद अमेरिका दूसरे स्थान पर है, अमेरिका के 203 यूनिकॉर्न हैं। भारत इस सूची में तीसरे स्थान पर, भारत के 21 यूनिकॉर्न हैं। भारत के कुछ प्रमुख यूनिकॉर्न One97 कम्युनिकेशन (10 अरब डॉलर), ओला कैब्स (6 अरब डॉलर) इत्यादि है। अमेरिका के ऑनलाइन टेक इंडस्ट्री के पब्लिशर टेकक्रंच (Techcrunch) के अनुसार, विश्वभर में मार्च 2018 तक 279 कंपनियां, यूनिकॉर्न कंपनियों में शामिल थी, जिनकी कुल संयुक्त क़ीमत 1 ट्रिलियन डॉलर थी और कुलपूंजी की राशि 205.8 बिलियन डॉलर थी। वर्तमान में दुनिया की सबसे बड़ी यूनिकॉर्न कंपनियों में चाइना की एंट फाइनेंशियल (Ant Financial) और डिडी (Didi), अमेरिका की उबर (Uber) स्ट्राइप (Stripe) और पिन्टरेस्ट आदि शामिल हैं। ये यूनिकॉर्न कंपनियां अभी तक कुछ देशों/क्षेत्रों में ही केंद्रित हैं जोकि इस प्रकार है : चीन में 128, अमेरिका में 100, भारत में 24, दक्षिण कोरिया में 8, यूके में 8 , इंडोनेशिया में 4, स्वीडन में 4, हांगकांग में 3, ऑस्ट्रेलिया में 2, फ्रांस में 2, सिंगापुर में 2 , स्विट्जरलैंड में 2 है। भारत में प्रमुख यूनिकॉर्न कंपनियां 10 हैं : डिजिटल पेमेंट्स कंपनी बिलडेस्क (BillDesk) (भुगतान कंपनी), पाइनलैब (Pine Lab) (भुगतान कंपनी), बायजूस (Byju’s) (ऑनलाइन लर्निंग प्रोग्राम), फ्रैसवॉर्क (Freshwork) (सॉफ्टवेयर कंपनी), ओयो (Oyo) (ऐप के जरिए होटल रूम्स बुकिंग), पेटीएममॉल (Paytm Mall) (ऑनलाइन रिटेल बिजनस), पॉलिसी बाजार (Policy Bazar) (भारतीय ऑनलाइन बीमा क्षेत्र में पहले प्रवेशकों में से एक), स्विगी (Swiggy) (ऐप के जरिए फूड डिलीवरी), उड़ान (Udaan) (बिजनेस टू बिजनेस ईकॉमर्स मार्केटप्लेस), जोमैटो (Zomato) (ऐप के जरिए फूड डिलीवरी) शामिल हैं।
सामरिक क्षेत्र में चीनी निवेश::
सामरिक चीनी निवेश पर भारत सरकार सतर्क रही। मोदी की नई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश-FDI नीति को यह कहकर टाल दिया कि भारत के साथ ज़मीनी सीमा से जुड़े देशों के सभी निवेशों को निवेश से पहले मंज़ूरी की आवश्यकता होगी। नई FDI ने चीनी पूंजीपतियों को चिंतित किया है। परन्तु यह नीति उस निवेश को प्रभावित नहीं करेगा जो अप्रैल 20 से पहले हो चुका है। चीनी निवेश की जाँच करने की नई भारतीय नीति के बाद, भारत में चीनी की उपस्थिति हर जगह दिखती है।
हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन का कच्चा माल चीन से ::
भारत हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन के निर्यातक देश के रूप में उभरा है। जिसे अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोरोना वायरस की प्रतिरोधक दवा के रूप में प्रचारित किया है। इस दवा का कच्चा माल जिसे एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स (एपीआई) कहते हैं, चीन से आयात किया जाता है। इसके अतरिक्त दूसरी निर्यात की जाने वाली दवा क्रोसीन, जिसका एपीआई पैरासीटामॉल भी चीन से आता है। वास्तविकता तो यह है कि भारत की दवा बनाने वाली कंपनियां क़रीब 70 फ़ीसदी एपीआई चीन से आयात करती हैं। वर्ष 2018-19 के वित्तीय वर्ष में देश की फर्मों ने चीन से 2.4 अरब डॉलर मूल्य की दवाइयां और एपीआई आयात किए। दवाइयों के निर्यात के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में से एक है। देश का दवा निर्यात 2018-19 में 11 प्रतिशत बढ़कर 19.2 अरब डॉलर हो गया है। इसमें जेनेरिक दवाएं भारतीय फ़ार्मास्युटिकल क्षेत्र का सबसे बड़ा हिस्सा हैं और कमाई के मामले में इनका मार्केट शेयर 75 फीसदी है। भारत की चीनी एपीआई पर निर्भरता का भी मुख्य कारण बहुत सिम्स तक यही है। भारत चीनी कच्चे माल को प्राथमिकता देता है क्योंकि यह बहुत सस्ता है और सामग्री वहां आसानी से उपलब्ध है। इससे दो विरोधी देशों की आपस में निर्भरता भी झलकती है। क्योंकि वर्तमान में स्थिति यह है कि सिचुआन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रो. हुआंग यूनसॉन्ग ने बीबीसी को बताया, ”चीन में कच्चा माल उपलब्ध कराने वाली कंपनियां भारत के फ़ार्मास्युटिकल निर्माताओं के बिना चल नहीं पाएंगी।”
भारत की चीन के आयात पर निर्भरता ::
यथार्थ तो यह है कि अभी भारत को चीन की ज़्यादा ज़रूरत है न कि चीन को भारत की। उनके द्विपक्षीय व्यापार में असंतुलन से यह और स्पष्ट होता है। वर्ष 2029 में द्विपक्षीय व्यापार क़रीब 90 अरब डॉलर का था इसमें क़रीब दो तिहाई हिस्सा भारत में चीनी निर्यात का था। यद्द्पि भारत -चीन के मध्य यह भी एक मुद्दा है। इसे यदि आसान तरीक़े से कहें तो, यह एक संरचनात्मक मुद्दा है क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्थाएं विकास के अलग-अलग स्तर पर हैं। इस मुद्दे का समाधान करने के लिए दोनों तरफ दीर्घकालिक योजना और धैर्य की ज़रूरत है। इसे अगर दूसरी तरह से देखें तो, इस व्यापारिक असंतुलन से भारत को फ़ायदा हो रहा है। तुलनात्मक रूप से सस्ते चीनी उत्पादों का आयात करके भारत ने क़ीमती फॉरेन करंसी रिज़र्व को बचाया है और अपनी पूंजी दक्षता में सुधार किया है। परन्तु कीच समाज विज्ञानी विशेषज्ञों का मानना है कि असंतुलन की परवाह किए बिना भारत चीन से आयात कर रहा है। दिल्ली में थिंक टैंक सोसाइटी फॉर पॉलिसी रिसर्च एंड एंपावरमेंट का तर्क है कि चीन भी व्यापक स्तर पर बड़े भारतीय बाज़ार को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। भारत चीन से आयात पर निर्भर हैं, इस बारे में कोई संदेह नहीं है। इसके अलावा, चीन भारतीय बाज़ार की विशाल क्षमता को देखते हुए इसे ख़ुद से दूर भी नहीं कर सकता, यह भी वास्तविकता है। भारत ही नहीं, अपितु कई देश चीन के साथ व्यापार असंतुलन से पीड़ित हैं। भारत के साथ चीन का व्यापार पिछले 15 वर्षों में लगभग एकतरफ़ा हो गया है और यह अधिकतर दूसरे देशों के साथ चीन के व्यापार का सच है। कोई भी द्विपक्षीय व्यापार, यहां तक कि एकतरफ़ा व्यापार, पारस्परिक निर्भरता बनाता है। यह कई तत्वों पर निर्भर करता है – नीतियों की प्रकृति, राजनीतिक नेतृत्व और आर्थिक ताक़त जो किसी भी देश को व्यापार से संबंधित तनावों से निपटने का अधिकार देता है, चाहे वह बहिष्कार हो या टैरिफ़ बढ़ाना हो।
ऐसा लगता है कि दोनों देशों को एक-दूसरे की ज़रूरत है। सत्य तो यह भी है कि चीन भारत को नजरअंदाज़ नहीं कर सकता। एक वैश्विक अर्थव्यवस्था में, देश एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। चीन-भारत संबंधों से निपटने के लिए एक ऐसे समय एक सन्तुलित और सकारात्मक मानसिकता को बढ़ावा देने की जरूरत है।विशेषतः जब कोविड-19 महामारी के कारण दुनिया इतनी कमज़ोर हो गई है। इस स्थिति में यदि आर्थिक तर्क एवं विकल्प के मुक़ाबले भू-राजनीति को अपनाने का विकल्प तय किया जाता है तो वैश्विक आपूर्ति की चेन निश्चित तौर पर बाधित हो जाएगी। केवल उस असामान्य परिस्थिति में, भारत चीन को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम उठा सकता है, जिसकी क़ीमत काफ़ी ज़्यादा होगी।
बहिष्कार अभियान स्थायी प्रभाव? ::
हमे इस पर भी गम्भीरता पूर्वक विचार करना होगा कि क्या चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का भारतीय अभियान दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करेगा? ऐसा माना जा रहा है कि भारत के द्वारा चीन के बहिष्कार का चीन पर आर्थिक प्रभाव से कहीं अधिक राजनीतिक प्रभाव पड़ेगा जो कोविड-19 महामारी के लिए वैश्विक विरोध का सामना कर रहा है। यह भी करना होगा कि क्या सोशल मीडिया कैंपेन मात्र एक भावनात्मक है? परन्तु सत्य तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध और राजनय सिर्फ़ भावनाओं से संचालित नहीं होते। इसमें यथार्थ का धरातल मजबूत होना चाहिए। आज यह चर्चा में है कि भारत-चीन के बीच व्यापार और राजनीतिक संबंध ख़राब करने वाले हैं। भारत में चीन के बहिष्कार को लेकर जो कैंपेन चल रहे हैं उन पर चीन कैसे प्रतिक्रिया दे रहा है?
चीन में नवाचार और आत्मनिर्भर भारत ::
चीन जो माओ से-तुंग और चाऊ एन लाई के युग में विश्व के विकसित राष्ट्रों से विज्ञान, तकनीकी और औद्योगिकीकरण के क्षेत्र में 20 वर्ष पीछे था तथा कृषि और कृषि के उत्पादों में 40 से 50 वर्ष पीछे था। वही चीन आज आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से न सिर्फ सशक्त और आत्मनिर्भर हुआ अपितु आज चीन औद्योगिक उत्पादन में विश्व में 4थे स्थान पर तथा जीएनपी की दृष्टि से 2सरे स्थान पर है। यह सब कैसे हुआ। इसका श्रेय देंग शियाओ पिंग की उदारीकरण और खुले द्वार की नीति को जाता है। आज प्रधनमंत्री मोदी जी ने आत्मनिर्भर भारत अभियान आरम्भ किया है। आगामी कुछ दशकों में भारत विविध क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होगा तथा लोकल टू वोकल और ग्लोबल की यात्रा तय कर विश्व में और अधिक सम्मान पाएगा इसमें सन्देह नहीं परन्तु चीन की विकास योजनाओं और उनका धरातल पर व्यापक स्वरूप को गम्भीरता से विश्लेषण कर भारतीय हितों के अनुरूप समझना चाहिए।
चीन में नवाचार के विकास में कई कारकों का योगदान रहा है।
(1) वर्ष 2007 में मोबाइल हैंडसेटों के निर्माण और बिक्री से जुड़े लाइसेंसिंग ढांचे का उदारीकरण किया गया था जिसने तेजी से फलते-फूलते घरेलू मोबाइल उद्योग के अभ्युदय में उत्प्रेरक की भूमिका निभाई। बाजार में नए प्रतिस्पर्धी व्यापारियों (खिलाड़ियों) की भरमार हो गई। इसके अतिरिक्त, शानझाई हैंडसेटों को वैध करार दे दिया गया। शानझाई मोबाइल फोन दरअसल किफायती 2जी फोन थे, जो जाने-माने ब्रांडों के उत्पादों की नकल थे।परिणामतः स्मार्टफोन हैंडसेटों की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट आई। वर्ष 2009 में मोबाइल हैंडसेट महज 9,761 रुपये में भी उपलब्ध थे। समय गुजरने के साथ ही चीन के मोबाइल उद्योग का विस्तारीकरण हुआ तथा इसमें कई और प्रतिस्पर्धी/ खिलाड़ी शामिल हो गए जिसके परिणामस्वरूप स्मार्टफोन की कीमतें घटकर और भी नीचे आ गईं। आज, चीनी स्मार्टफोन का मूल्य आठ साल पहले की तुलना में आधे से भी कम हो गया है। चीन के घरेलू मोबाइल संचार उद्योग के जबरदस्त विकास का ही यह कमाल है कि आज चीन की 75 फीसदी आबादी के पास स्मार्टफोन है।
(2) चीन देश के 1 अरब इंटरनेट उपयोगकर्ता नई प्रौद्योगिकियों और एप्लीकेशंस (एप) के लिए एकदम सटीक प्लेटफॉर्म या माहौल सुलभ कराते हैं। केवल ऐसे अभिनव उत्पाद जो अपनी दमदार क्षमता को साबित कर सकते हैं, वे ही अत्यंत प्रतिस्पर्धी चीनी प्रौद्योगिकी बाजार में टिक सकते हैं। (3) चीन में नवाचार के लिए ‘शीर्ष से नीचे की ओर अग्रसर (टॉप-डाउन) दृष्टिकोण’ को अपनाया जाता है। चीनी सरकार प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारी-भरकम निवेश करती है और विशिष्ट मुद्दों पर अपने रुख को नरम करने के लिए सदैव तत्पर रहती है, बशर्ते कि उससे और अधिक सरलता सुनिश्चित होती हो। उदाहरण के लिए, वर्ष 2012 में चीन ने अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 2 फीसदी अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) को समर्पित कर दिया था। एक और अहम बात। चीन के पास प्रौद्योगिकी क्षेत्र में मानव पूंजी का खजाना है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 55 फीसदी चीनी डॉक्टरेट डिग्री विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्र में दी जाती हैं। वर्ष 2015 की ‘यूएस न्यूज एंड वर्ल्ड रिपोर्ट’, जो अलग-अलग मानदंडों पर दुनिया भर के विश्वविद्यालयों की रैंकिंग करती है, के मुताबिक चीन का सिंघुआ विश्वविद्यालय अब मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) को पीछे छोड़कर दुनिया का शीर्ष इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय बन गया है।
चीन ने तकनीकी विकास के जो मानक स्थापित किए हैं इन्हें नहीं तो उनके आधार पर आत्मनिर्भर भारत की दिशा में प्रभावकारी और अनुकरणीय रणनीति बना सकते हैं। (i) सोच स्थानीय हो, अमल वैश्विक हो— भारत और चीन दोनों ने ही घरेलु मुद्दों को सुलझाने के लिए तकनीकी समाधान विकसित किए हैं। हालांकि, भारतीय कंपनियों की तुलना में चीनी प्रौद्योगिकी कंपनियों की वैश्विक मौजूदगी कहीं ज्यादा है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनों को ही ऐसे तौर-तरीके ढूंढ़ने चाहिए जिनके माध्यम से भारत का प्रौद्योगिकी क्षेत्र अपनी वैश्विक पहुंच को विस्तृत कर सकता है। इस संबंध में एक उत्साहवर्धक तथ्य यह है कि कई देश भारत के विशिष्ट पहचान डेटाबेस (यूआईडी) यानी ‘आधार’ का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं। (ii) मानव पूंजी में निवेश करें— भारत में अनुसंधान एवं विकास में सरकारी निवेश अब भी अपेक्षा से कम है। भारत अनुसंधान पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.9 फीसदी ही निवेश करता है। इसके अतिरिक्त, अतिशय नौकरशाही भारत के अनुसंधान परिदृश्य में बाधा डालती है। भारत के सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में ज्यादातर प्रशासकों की नियुक्ति राजनैतिक दृष्टि से की जाती है। इनमें से ज्यादातर व्यक्तियों की अनुसंधान संबंधी कोई वास्तविक पृष्ठभूमि नहीं होती है। इसके अलावा, भारत में हर 10,000 लोगों में से केवल 4 ही पूर्णकालिक शोधकर्ता हैं, जबकि चीन में यह आंकड़ा 18 है। अतः भारत को अपने अनुसंधान केंद्रों में लालफीताशाही कम करने के लिए अवश्य ही ठोस कदम उठाने चाहिए और देश में शोध गतिविधियों के वित्तपोषण के ठोस तौर-तरीके ढूंढ़ने चाहिए। (iii) यद्द्पि चुनौतियां बड़ी हैं, लेकिन भारत को भी इस मामले में चीन की भांति ही समान बढ़त हासिल है क्योंकि भारत की आबादी भी विशाल है। कनेक्टिविटी दरें अत्यंत संतोषजनक हैं और उसे विशिष्ट वैज्ञानिक दक्षताएं हासिल हैं। इसके अतिरिक्त, भारत भी अनेक अभिनव सृजन करने में कामयाब रहा है, जो दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए आदर्श रूप में विद्यमान हैं। विशेष रूप से, कई देश भारत के ‘आधार’ डेटाबेस की पुनरावृत्तियां तैयार करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। भारत भी यदि निकट भविष्य में वैश्विक तकनीकी क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी या राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आना चाहता है तो उसे अवश्य ही स्थानीय तौर पर विकसित अभिनव उत्पादों या चीजों का निर्यात करने के तरीके तलाशने चाहिए और आबादी के मामले में हासिल बढ़त से भरपूर लाभ उठाना चाहिए।
प्रो.रामदेव भारद्वाज
कुलपति
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल