बहादुर बिटिया ज्योति कुमारी को देश का सब से बड़ा नागरिक सम्मान मिले

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श्रवण कुमार द्वारा दृष्टिहीन माता -पिता को काँवर पर बिठा कर तीर्थयात्रा करवाने की कथा बचपन से सुनता आ रहा हूँ . पता नहीं यह कथा पौराणिक है या ऐतिहासिक . जो भी है ,कथा तो है ही . कई बार मुझे लगता था , माता -पिता जब दृष्टिहीन थे , तब उन्हें देश घुमाने का क्या मतलब ! क्योंकि वह देखते तो कुछ नहीं होंगे . फिर महसूस हुआ बेटे या फिर माता -पिता की खब्त ही सही . उस वक़्त कोई गिनीज़ बुक ऑफ़ रिकार्ड्स तो था नहीं ,जो श्रवण कुमार को अपना नाम दर्ज़ करवाना था . पुराने ज़माने से श्रवण कुमार एक किंवदंती बना हुआ है .

लेकिन हमारे बिहार की एक बिटिया ज्योति कुमारी ,जो मात्र पंद्रह साल की है , ने कमाल कर दिखाया है . वह है . कोरोना -काल में अपने बीमार पिता को उसने हरियाणा से साईकिल पर बिठाया और बारह सौ किलोमीटर से अधिक दूर बिहार के दरभंगा शहर ले आई ; अपने गांव . ( देश जब धोखा देता है , गांव बुलाता है ) उसे गांव आने में कुल आठ रोज लगे . ज्योति की तारीफ़ के लिए मेरे पास शब्द नहीं है . शब्दों के कुबेर तो कवि होते हैं . एक कवि कृष्ण कल्पित ने ज्योति के लिए कुछ शब्द इकट्ठे किये और अपनी संवेदना से उन्हें सजाया . मैं उस कवि से शब्दों को चुराने के बजाय उसे जस -का -तस रख देना बेहतर समझा है . देखिये कृष्ण कल्पित की कविता –

मैं तुम्हारे तलुओं पर
जैतून के तेल की मालिश करना चाहता हूँ

जिन हाथों से थामा था तुमने साइकिल का हैंडल
मैं उन हाथों को चूमना चाहता हूँ

गुरुग्राम से दरभंगा तक
अपने घायल पिता को कैरियर पर बिठाकर
ले जाने वाली स्वर्णपरी
मैं तुम्हारी जय-जयकार करना चाहता हूँ

तुम्हारी करुणा तुम्हारा प्यार तुम्हारा साहस देखकर हैरान हूँ आश्चर्य से खुली हुई हैं मेरी आँखें

मैं उन तमाम 33 कोटि देवी-देवताओं को
बर्ख़ास्त करना चाहता हूँ
जिन्होंने नहीं की तुम पर पुष्प-वर्षा

मोटर-गाड़ियों रेल-गाड़ियों और हवाई-जहाज़ों का आविष्कार क्या आततायियों अपराधियों और धनपशुओं के लिए किया गया था

इस महामारी में तुमने अपने चपल-पांवों से
1200 किलोमीटर तक भारतीय सड़कों पर सात-दिनों तक जो महाकाव्य लिखा है वह पर्याप्त है इस देश के महाकवियों को शर्मिन्दा करने के लिए

डूब मरो शासको
डूब मरो कवियो
डूब मरो महाजनो

ओ, साइकिल चलाने वाली मेरी बेटी
मैं तुम्हें अन्तस्तल से प्यार करना चाहता हूँ !

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