पुरानी पीढ़ी के ऋषि-तुल्य हिन्दी-सेवी थे दामोदर सहाय ‘कविकिंकर’-डा अनिल सुलभ

अपने समय के अत्यंत आदरणीय कवि दामोदर सहाय ‘कविकिंकर’ एक प्रणम्य और ऋषि-तुल्य कवि थे। एक ऐसे स्वनाम-धन्य कवि, जिनके ‘कवि’ का उद्भव पीड़ा के सागर से ‘कमल’ सदृश हुआ था। इनकी माँ तब चल बसी जब इन्होंने ‘माँ का दूध’ भी न छोड़ा था! सात महीने के अबोध शिशु थे। और, पिता तब […]